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मँगला पे भीख ना मिले, मान्यता कइसे मिली?

नवम्बर 2006, भोजपुरी साहित्य अउर आंदोलन खातिर काम कइ रहल सबसे बडहन संस्था अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के राष्ट्रीय अधिवेशन के मंच, अउर ओह मंच पर विराजमान दू-दूगो केन्द्रीय मंत्री – श्रीमती मीरा कुमार अउर श्री रधुवंश नारायण सिंह। श्रीमती मीरा कुमार त भोजपुरिया क्षेत्र के बेटी हई, त भोजपुरी के मान्यता संसद के अगिला सत्र में कराये के बात करबे कइली, लेकिन उनुका संगे-संगे रघुवंश बाबु भी भोजपुरिये में आपन भाषण देत, एह भाषा के संविधान के आठवीं अनुसूची में ले आये खातिर जान लगा दिहला के वादा कइलन। सामने बइठल हजारन लोगन के भीड उत्साहित होके ताली बजावत रहे कि अब भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में जाये से केहु ना रोक पाई।

साल 2009, सासाराम में एनटीपीसी के गेस्ट हाउस, मीरा कुमार जी के लोकसभा अध्यक्ष बनला के तुरंत बाद अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के एगो प्रतिनिधिमंडल उनुका से मिले दोबारा गइल, फेर एगो माँग-पत्र दियाइल, जवना में पहिला माँग भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल करे खातिर रहे, मीरा जी कहली कि अगिला सत्र में हो जाई। एकरा बादो ना जाने केतना बेर लोकसभा अध्यक्ष जी भोजपुरी के कई गो कार्यक्रमन में उहे वादा दुहरा चुकल बाडी, लेकिन ओकर नतीजा कुछ नइखे निकलल। एकरा अलावा, संसद में बकायदा गृह मंत्री अउर ना जाने के-के एह बारे में वादा कइ चुकल बाडन, लेकिन पता ता मान्यता के दी? केतना गो सांसद अउर मंत्री केतना गो भोजपुरी के सम्मेलन में ई वादा कइले बाडे, एकर गिनती राखल भी असंभव बा।

साल 2013, 5 अगस्त के महाराजगंज (बिहार) से जीत के गइल सांसद श्री प्रभुनाथ सिंह लोकसभा अध्यक्ष से भोजपुरी में शपथ लेवे के बात करुअन, त लोकसभा अध्यक्ष उनका के हिन्दी में शपथ लेवे खातिर कहली, अउर ऊ ओह शर्त पर तैयार भइलन कि सरकार भोजपुरी के मान्यता देवे खातिर पहल करी। ओकरा बाद, जब पिछला हफ्ता (6 सितम्बर) लोकसभा में शून्यकाल के दौरान प्रभुनाथ सिंह भोजपुरी के मान्यता के बात उठवलन, अउर ई कहलन कि गृह विभाग के 2-3 दिन बेर वादा कइला का बादो एह दिशा में कुछो काहें नइखे होत, तब माननीय अध्यक्ष महोदया उनुका के इ कह के रोक देहली कि भारत के संसद दुनिया में अकेला हवे, जहंवा पहिलहीं से 22 भाषा में कार्यवाही के लेखा-जोखा राखल जाला। ओकरा बाद वइसे ऊ इहो कहली कि हमनी का अउर भाषा के जोडे खातिर तैयार बानी जा, लेकिन ओह पर एगो वादा के छलावा के सिवा कुछो ना मिलल।

हमनी का सरकार के खिलाफ नइखी जा, अउर लोकसभा अध्यक्ष के गरिमा के हमनी का सम्मान करेनी जा, लेकिन का ई कुल्ह घटना के पढला के बादो ई नइखे बुझात कि सरकार भोजपुरी खातिर केतना गंभीर बिया? भोजपुरिया क्षेत्र (बिहार अउर पुर्वी उत्तर प्रदेश) से कई दर्जन सांसद ओहिजा बइठल रहेला लोग, लेकिन भोजपुरी खातिर बात कइल ओह लोगिन के पार ना लगेला, त आखिर काहें? आखिर कब ले हमनी के समाज एही तरह इंतजार करत रही…?

अब एही घटना के एगो दोसर पहलू पर ध्यान दीं – लोकसभा में अकाली दल के दुगो पंजाबी सांसद भोजपुरी के मान्यता के माँग एह आधार पर उठावल लोग, कि ओह लोगिन के पवित्र ग्रंथ “गुरु ग्रंथ साहिब” में कबीर के कई गो दोहा सम्मिलित बाटे, अउर ओह दोहा के भाषा (भोजपुरी) के आजु ले मान्यता नइखे मिलल, ई ठीक नइखे। एह लोगन के अहसान भोजपुरिया समाज कबो ना भुलाई, लेकिन हद त तब हो गइल, जब ओही समय (एकाध लोगन के छोड के) भोजपुरिया क्षेत्र के कवनो सांसद उनका समर्थन में ना खडा भइल। हमनी के भोजपुरिया सांसदन के आँखि में अगर तनिको पानी रहित, त ओही दिने लाज से मर गइल रहिते सन, लेकिन ना, हमनी किहाँ वोट भोजपुरी के नांव पे ना, बल्कि जाति-धर्म के नांव पर दिहल जाला, फेर काहे के चिंता….?

एह से इहे बुझाता कि भोजपुरी अगर आज संविधान के आठवीं अनुसूची में नइखे, त एकरा पिछे भी कहीं न कहीं गलती हमनिये में त नइखे…? एक बेर अगर भोजपुरिया क्षेत्र के जनता जाग जाव, अउर जाति-धर्म से उपर उठ के ओही आदमी के वोट देवे के बात करो, जे भोजपुरी के मान्यता खातिर संसद में आवाज उठाई, अउर “मान्यता ना, त वोटो ना” के नारा बुलंद करो, त फेर भोजपुरी के मान्यता मिलला में देर ना लागी। भोजपुरिया समाज के याद राखे के चाहीं कि मँगला पर त भीख ना मिलेला, फेर मान्यता कइले मिली? भोजपुरी आंदोलन के स्वरुप व्यापक बनवला बिना, अउर तेवर सख्त कइला बिना काम ना चली। भोजपुरिया क्षेत्र के सांसदन के घेराव होखो, अउर ओह लोगन के मजबूर कइल जाव संसद में भोजपुरी के माँग बुलंद करे खातिर, एह चेतावनी के साथ कि चुनाव में अब ढेर दिन नइखे बाचल, अउर अगर मान्यता ना मिलल, त फेर वोटो ना मिली… का हमनी के समाज अपना माई-भाषा खातिर एतनो ना कइ सकेला…?